दिक्षा कऱ्हाडे
वृत्त संपादिका
गुजरात का ऊना कांड केवल एक घटना नहीं था, यह इस देश की व्यवस्था और सोच पर लगा एक काला धब्बा था।
जून 2016 में “गाय के नाम पर” चार दलित युवकों को जिस तरह गाड़ी से बांधकर दिनदहाड़े पीटा गया, वह केवल कुछ लोगों की हिंसा नहीं थी। वह एक सुनियोजित संगठित अत्याचार था, जिसे पूरे देश ने अपनी आँखों से देखा।
उस वक्त लाखों लोग सड़कों पर उतरे, दलित, अंबेडकरवादी और हर इंसाफ पसंद नागरिक ने आवाज़ बुलंद की। अहमदाबाद से ऊना तक की 400 किलोमीटर की यात्रा सिर्फ एक मार्च नहीं थी, वह इस व्यवस्था को आईना दिखाने की कोशिश थी।
लेकिन आज, इतने सालों बाद, जब न्याय की उम्मीद थी, तो जो फैसला आया है, वह कई सवाल छोड़ गया है।
सिर्फ 5 लोगों को दोषी ठहराना और 35 से ज्यादा आरोपियों को बरी कर देना, क्या यह सच में न्याय है? या फिर यह उस कमजोर पड़ती हुई इच्छाशक्ति का संकेत है जो सत्ता और प्रभाव के आगे झुक जाती है?
हम न्यायपालिका का सम्मान करते हैं, लेकिन यह भी उतनी ही मजबूती से कहते हैं कि न्याय सिर्फ आंशिक नहीं हो सकता। न्याय या तो पूरा होता है, या फिर वह न्याय नहीं होता।
यह लड़ाई किसी व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ है, जो दलितों के सम्मान और अधिकार को आज भी हल्के में लेती है।
हम इस फैसले को अंतिम सत्य मानने को तैयार नहीं हैं। हम संवैधानिक रास्तों पर चलते हुए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे, हर उस दरवाजे पर दस्तक देंगे। जहाँ से न्याय की उम्मीद हो सकती है।
यह संघर्ष जारी रहेगा…
संविधान की ताकत से, सत्य की ताकत से और उस विश्वास के साथ कि इस देश में इंसाफ अभी भी जिंदा है, और उसे हासिल करके ही रहेंगे।


