Home देशविदेश तानाशाह का भविष्य :- विष्णु नागर…

तानाशाह का भविष्य :- विष्णु नागर…

        वैसे तो मेरे वे दोस्त बहुत ज्ञानी हैं,मगर उन्हें न जाने क्या सूझी कि उन्होंने मुझसे पूछा कि हमारा तानाशाह जो कुछ कर रहा है,वह सब आज नहीं,कल नहीं,परसों नहीं,बरसों नहीं,मगर कभी तो सामने आएगा? पचास साल बाद तो सामने आएगा?

       मैंने कहा,आएगा और जल्दी ही सामने आएगा। इसने ऐसी स्थिति में अपने को डाल दिया है कि इसका पतन अब कोई ताकत अधिक समय तक रोक नहीं सकती। फिर भी सुविधा के लिए मान लें कि दस बरस बाद यह जाएगा। तब सब कुछ सामने आएगा। इसका ही नहीं, इसके साथ के सब लोगों का कच्चा चिट्ठा सामने आएगा।एक-एक चीज़ आज दर्ज की जा रही है। इसे वे भी दर्ज कर रहे हैं,जो आज इसके अपने हैं।उनके मन में डर है कि कल पांसा पलट गया,तो उनका गला भी नापा जा सकता है और कब,कौन-सी चिनगारी आग बन जाएगी,यह कोई नहीं जानता!

        ऐसा नहीं कि तानाशाह खुद यह बात नहीं जानता। जानता है, मगर फिलहाल उसकी चिंता सत्ता पर अपनी पकड़ को और मजबूत बनाना है,अपने मजबूत विरोधियों को कुचलना है। उन्हें विभिन्न माध्यमों से इतना बदनाम कर देना है कि वे जनता के सामने जाने से भी डरें और नहीं डरें, तो इसका नतीजा भुगतें।

        हर तानाशाह यह मानता है कि वह इतना कुशल है कि जीते-जी उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। बाद मरने के उसके बारे में क्या-क्या सामने आता है,क्या-क्या राज खुलते हैं,इसकी उसे चिंता नहीं, क्योंकि वह तो अपनी पारी सफलता से खेल चुका है।

       उसका सारा खेल,उसकी सारी राजनीति आज के लिए है। उसे आज उसकी छवि बनाना है। वह जानता है कि उसके जीते-जी भी उसकी बनाई छवि टूटती रहती है,उसमें वह पैबंद लगाता रहता है। 

        हमारा तानाशाह जान चुका है कि ईमानदारी से वह चुनाव नहीं जीत सकता, इसलिए चुनाव आयोग को उसने सरकार के एक सरकारी विभाग में बदल दिया है। इस तरह वह मानता है कि वह टिका रहेगा। फिर राज्य की शक्ति उसके पास है,उसका इस्तेमाल कर वह विपरीत जनमत को भी सकारात्मक वोट में बदल सकता है। फिलहाल हमारे तानाशाह का जोर पूरे भारत की राजनीति पर कब्जा करना है और अपने को निर्विकल्प बनाना है।

       तानाशाह जानते हैं कि उनका भविष्य क्या है। लोग उन्हें कल किस रूप में याद करेंगे। उन्हें मालूम है कि उनकी पूजा नहीं होगी। उनकी तुलना महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से नहीं होगी। उन्हें उसी तरह देखा जाएगा,जिस तरह देखा जाना किसी तानाशाह को पसंद नहीं आता। उनकी कोशिश यह होती है कि ऐसी नौबत नहीं आए,जो हिटलर और मुसोलिनी के सामने आई थी। पर कौन जानता है, कौन तय कर सकता है कि कल उसके साथ क्या होगा।

       मगर तानाशाह ने जितना नुकसान किया होता है,उसकी भरपाई आसानी से नहीं होती। युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है, तानाशाह के किये नुकसान की बहुत मुश्किल होती है। पीढ़ियां लग जाती हैं, बहुत कुछ दुरुस्त करने में!

     ( कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है..‌‌.)